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मानसून में नीम खाने के फायदे, इम्यूनिटी से लेकर त्वचा तक रखेगा ध्यान

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बरसात का मौसम अपने साथ हरियाली तो लाता है, लेकिन यही मौसम बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के तेजी से बढ़ने का भी समय होता है। मौसम बदलने के दौरान हमारे शरीर में दोषों (वात, कफ व पित्त) का स्तर ऊपर-नीचे होता रहता है, जिससे इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है। आयुर्वेद के अनुसार, मानसून के मौसम में शरीर में पित्त दोष स्वाभाविक रूप से जमा होने लगता है और जठराग्नि (पाचन शक्ति) धीमी पड़ जाती है। ऐसे में डॉ. राजेश बयारी (एमडी, चित्रकूट आयुर्वेद चिकित्सालय, कुंडपुरा) बताते हैं कि आप इस मौसम में नीम का सेवन कर सकते हैं। नीम का स्वाद कड़वा होता है और इसकी तासीर ठंडी होती है; इसलिए आयुर्वेद में इसे रक्तशोधक और बढ़े हुए पित्त व कफ दोषों को संतुलित करने के लिए एक रामबाण उपाय माना जाता है।

मौसम बदलने पर नीम खाने के बारे में आयुर्वेद क्या कहता है?
आयुर्वेद के अनुसार ऋतु परिवर्तन के दौरान शरीर में दोषों का संतुलन बिगड़ सकता है। मानसून में विशेष रूप से पाचन शक्ति (अग्नि) कमजोर होने लगती है। साथ ही, पित्त दोष प्रभावित हो सकते हैं। इस समय नीम जैसी कड़वी औषधियों का सीमित मात्रा में सेवन शरीर को संतुलित रखने में सहायक माना जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में नीम को रक्तशोधक, कृमिनाशक (पेट के कीड़े मारने वाले), त्वचा हितकारी और रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग देने वाला पौधा बताया गया है। हालांकि इसका सेवन व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार होना चाहिए।

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आधुनिक रिसर्च नीम के बायोएक्टिव कंपाउंड्स के बारे में क्या कहती है?
वहीं दूसरी ओर, आधुनिक मेडिकल रिसर्च के अनुसार नीम में बायोएक्टिव कंपाउंड्स, जैसे कि निम्बिडिन, अजादिराक्टिन और निम्बिन पाए जाते हैं। इन कंपाउंड्स में बेहतरीन एंटीमाइक्रोबियल और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को मानसून के दौरान होने वाले इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करते हैं।

मानसून में नीम खाने के क्या फायदे होते हैं?
इम्यूनिटी बढ़ाए
बारिश के मौसम में होने वाले मौसमी संक्रामक बुखार से लड़ने के लिए नीम व्हाइट ब्लड सेल्स (WBCs) को सक्रिय करता है और पूरे इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। नीम में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और बायोएक्टिव कंपाउंड्स शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य को सहयोग दे सकते हैं।

त्वचा की समस्याओं से राहत
इस मौसम में हवा में नमी ज्यादा होने के कारण मुंहासे, एलर्जी, खुजली और त्वचा की अन्य बीमारियां बढ़ जाती हैं। नीम खून को साफ करता है और त्वचा को अंदर से प्राकृतिक चमक देता है। यही वजह है कि स्किन की परेशानियों में आयुर्वेद में नीम का पाउडर लेने की सलाह दी जाती है।

हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस को रोके
मानसून के दिनों में उमस के कारण फंगस और बैक्टीरिया पनपने का जोखिम अधिक होता है। लेकिन, जो लोग बरसात में नीम का सेवन करते हैं उनको सूजन और फंगल इंफेक्शन का खतरा कम होता है। साथ ही, नीम में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-माइक्रोबियल गुण फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण को रोकने में भी मदद करते हैं।

पाचन तंत्र में करें सुधार
मानसून में दूषित भोजन और पानी के कारण पेट संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। आयुर्वेद के अनुसार नीम का सीमित सेवन पाचन शक्ति को सहयोग देने और कृमियों (आंतों के कीड़े) के जोखिम को कम करने में उपयोगी मानी गई है। यही वजह है कि पहले के समय में पेट से जुड़ी समस्या में नीम का सेवन किया जाता था।
मानसून में नीम का सेवन किस तरह से करें?
मानसून के दौरान, आप रोज सुबह खाली पेट नीम की तीन से चार कोमल पत्तियां चबा सकते हैं या सीमित मात्रा में इसका रस पी सकते हैं। यह आपको मौसमी बीमारियों से बचाने के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है।

आयुर्वेद के अनुसार मानसून में नीम का सीमित और सही तरीके से सेवन करने से मौसम में हुए बदलाव का असर शरीर पर कम पड़ता है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इसके एंटीऑक्सीडेंट, एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुणों की पुष्टि करते हैं, लेकिन अधिकांश साक्ष्य अभी प्रयोगशाला और प्रारंभिक अध्ययनों पर आधारित हैं। इसलिए नीम को किसी बीमारी के इलाज के रूप में नहीं, बल्कि संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के पूरक के रूप में ही अपनाना चाहिए।

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