Home अध्यात्म नियमबद्धता सृष्टि का स्वाभाविक चरित्र है

नियमबद्धता सृष्टि का स्वाभाविक चरित्र है

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धर्म, सदाचार और नैतिकता के पाठ मनुष्य को दिशा दिखाने के लिए हैं। वे सत्य, असत्य का भेद करना सिखा सकते हैं। मनुष्य को जीवन मार्ग पर चलना स्वयं ही पड़ता है और निर्णय भी खुद ही लेने होते हैं। मार्ग सही हो, निर्णय उचित हों, इसे सुनिश्चित करना संभव है। इसके लिए लोभ और मोह त्यागना होता है। क्रोध और अहंकार त्यागना होता है। काम को वश में करना होता है। यही आत्म-नियंत्रण है। स्वयं पर नियंत्रण नहीं, तो धर्म, नैतिकता और सदाचरण की बात व्यर्थ है। जीवन में समस्याओं और दुखों का कारण आत्म-नियंत्रण न होना है। धर्म कोई चमत्कार नहीं करता।

धर्म के प्रकाश में किए गए कर्म ही फल देते हैं। बड़े परिणामों के लिए विकारों को वश में करना तो दूर रहा, मनुष्य जीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए भी कोई प्रयास नहीं कर रहा है। इससे समस्याओं के अंबार लगे हुए हैं। आज वह हर तरह के लोभ के प्रभाव में है। जीवन कैसा हो, इसका संदेश प्रकृति में ही छिपा हुआ है। संपूर्ण सृष्टि एक नियम में चल रही है। कभी ऐसा नहीं हुआ कि रात के बाद दिन न आया हो। वायु और जल निरंतर प्रवाह में हैं। मौसमों का क्रम अपरिवर्तनीय है। पतझड़ के बाद वसंत को ही आना है। धरती असीम भार सहकर भी अपने स्थान पर टिकी हुई है। जब से सृष्टि का निर्माण हुआ है, तभी से ऐसा चल रहा है। नियमबद्धता सृष्टि का स्वाभाविक चरित्र है। मनुष्य भी इसका अंश है, किंतु वह इस चरित्र को नकार रहा है। मर्यादा पालन, सहयोग व समन्वय व समयबद्धता आदि का जीवन से पलायन हो चुका है।

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मनुष्य के अतिरिक्त किसी भी जीव का स्थायी आवास नहीं होता। मनुष्य ने आवास बनाया, किंतु उसे बनाने में इतना श्रम और नियोजन किया, मानो उसे सदियों उसमें रहना है, सारे जीव प्राकृतिक खाद्य पदार्थों पर निर्भर हैं, मनुष्य ने खाद्य पदार्थो के नए-नए रूप बना लिए हैं। सृष्टि बहुरंगी है, किंतु मनुष्य को यह स्वीकार नहीं है कि उसे हर वह चीज चाहिए जो किसी दूसरे के पास है। इस प्रवृत्ति ने उसके जीवन को उद्दंड बना दिया है। प्रतिस्पर्धा के नाम पर आज जो कुछ किया जा रहा है वह उद्दंडता ही है। कभी उदार और दयालु होने में, सहयोग और सहायता देने में विनम्र और विकार रहित होने में तो कोई प्रतिस्पर्धा होते नहीं दिखती है।

 

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