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एलपीजी पर बड़ी सख्ती: घरेलू और कॉमर्शियल गैस उपयोग पर तेल कंपनियों की जांच तेज

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लखनऊ
घरेलू सिलेंडरों की हर रीफिल पर चेक लगाने के बाद तेल कंपनियों ने कॉमर्शियल की दिशा में कदम बढ़ाया है। सभी कनेक्शन धारकों का बीती अवधि का उपयोग का विवरण तैयार किया जा रहा है। जिन कनेक्शन धारकों ने नाम मात्र को रीफिल ली है, उनको संदिग्ध की सूची में डाला जा रहा है। वहीं अत्यधिक उपयोग वाले उपभोक्ता भी चिन्हित किए जा रहे हैं। इनका ऑडिट कराकर उपयोग की वास्तविक स्थिति जानी जाएगी।

बीती अवधि में प्रबंधन के पास गैस कटिंग की शिकायतें पहुंची हैं। इसमें सस्ती घरेलू गैस से कॉमर्शियल की रीफिलिंग की शिकायत प्रमुख है। गैस कटिंग से तैयार किए गए इस सिलेंडर को कॉमर्शियल के उपयोगकर्ता को सरकारी रेट से कम पर उपलब्ध कराए जाने का आरोप है। इसको संज्ञान में लेकर तेल कंपनियों ने संबंधित कनेक्शन धारक का ब्योरा तलब कर उसके अधिकतम एवं न्यूनतम उपयोग का विवरण तैयार किया है। इस विवरण में इस बात का उल्लेख है कि एक रीफिल से दूसरी रीफिल के बीच कितना अंतर है। बीती अवधि में कितने अंतर से रीफिल ली गईं। इस समय यह अंतर कितना है।

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बिगड़ सकती है आपूर्ति
वितरण से जुड़े लोगों ने बताया कि एक बड़ा वर्ग किसी भी तरह घरेलू गैस को हासिल करने की जुगत में लग गया है। किल्लत के समय में गैस की बुकिंग का स्तर लगातार बढ़ रहा है। ऐसे हालातों में वास्तविक जरूरतमंद घरों तक समय से गैस पहुंचाने की दिक्कत हो गई है। जो वितरक एक से दो दिन के अंदर अपने उपभोक्ताओं के यहां रीफिल पहुंचा देते थे, एक से अधिक का समय लेने लग गए हैं। वहीं तेल कंपनियां गैस की सीमित आपूर्ति दे रही हैं।

जांच की वजह
इस समय घरेलू उपयोग की एलपीजी खरीदार को 67.22 रुपये प्रति किलो पड़ रही है। जबकि कॉमर्शियल उपयोगकर्ता को एक किलो गैस के लिए 166.71 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। दोनों मदों में अंतर 99.69 रुपये किलो के स्तर तक पहुंच गया है। इस अंतर के चलते बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल के 19 किलो के सिलेंडर में घरेलू गैस को भर कर बेचा जा रहा है। खरीदार को 300 रुपये की छूट देकर यह सिलेंडर 2800-2900 रुपये का दिया जा रहा है।

आगरा संभाग, इंडेन वितरक संघ के अध्यक्ष, विपुल पुरोहित ने कहा कि कुछ ऐसे हलवाई चिन्हित किए गए हैं जिनका एलपीजी उपयोग सामान्य नहीं है। त्योहार के समय अधिक मांग की संभावना होने के बावजूद इनके द्वारा अपेक्षित रीफिल नहीं ली गई। कुछ रेस्टोरेंट भी चिन्हित किए गए हैं। इनका भी यही हाल है। पूरे एक महीने में नाममात्र की रीफिल ली गईं। जब कॉमर्शियल की किल्लत चल रही थी, उस समय इनकी तरफ से लगातार मांग थी। संदेह है कि इनके द्वारा अन्य स्रोतों से गैस हासिकल करने का प्रयास चल रहा है।

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